Bihar SIR: सुप्रीम कोर्ट में बिहार SIR पर सुनवाई, ‘ड्यू प्रोसेस’ और ट्रंप का भी हुआ जिक्र, जानें क्यों...
Thursday, Jan 22, 2026-06:18 PM (IST)
Bihar SIR: सुप्रीम कोर्ट में बिहार में विशेष गहन वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान मामला जल्दी ही राजनीतिक से अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में पहुँच गया। शुरुआत में चर्चा बिहार की वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया पर केंद्रित थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने अमेरिका और अन्य देशों के न्यायिक उदाहरणों को पेश करते हुए ‘ड्यू प्रोसेस’ (Due Process) की व्यापक बहस शुरू कर दी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क: लाखों नाम हटाने का खतरा
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बिहार में मतदाता सूची में संशोधन के दौरान लाखों लोगों के नाम मनमाने तरीके से हटाए जा सकते हैं। उन्होंने अमेरिका समेत अन्य देशों के उदाहरणों को पेश करते हुए न्यायिक दृष्टिकोण से इस प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाया।
चुनाव आयोग की ने जताई कड़ी आपत्ति
इस पर चुनाव आयोग ने कड़ी आपत्ति जताई। आयोग के वकील ने कोर्ट को बताया कि विदेशी उदाहरण, विशेषकर अमेरिका के मामले, भारत में सीधे लागू नहीं होते। उन्होंने कहा कि अमेरिका में ‘ड्यू प्रोसेस’ की परिभाषा भी विवादों में है और परिस्थितियां भारत से पूरी तरह अलग हैं।
अमेरिका और ट्रंप का जिक्र
सुनवाई के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयानों का भी जिक्र आया। आयोग के वकील ने बताया कि ट्रंप ने ग्रीनलैंड जैसे विदेशी क्षेत्रों को लेकर आक्रामक टिप्पणियां की हैं और अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाओं पर बहस छेड़ी है। आयोग ने तर्क दिया कि अगर अमेरिका जैसे विकसित देश में भी कार्यपालिका के आचरण और ‘ड्यू प्रोसेस’ पर विवाद है, तो उनके उदाहरणों को भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर थोपना उचित नहीं होगा।
भारतीय चुनावी प्रक्रिया: संविधान और कानून के तहत
चुनाव आयोग ने यह स्पष्ट किया कि भारत में चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह संविधान और कानून के तहत संचालित होती है। अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने का अधिकार और जिम्मेदारी प्राप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह पूछा कि क्या आयोग की प्रक्रिया नागरिकता निर्धारण की सीमा में प्रवेश कर रही है। अदालत ने कहा कि संविधान नागरिकों को अंतर-राज्यीय आवागमन और बसने का अधिकार देता है और इसे अवैध माइग्रेशन से जोड़ना सही नहीं होगा। नागरिकता से जुड़े सवाल विधायी ढांचे के अंतर्गत आते हैं, केवल चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं।
28 जनवरी को होगी अगली सुनवाई
अदालत ने फिलहाल आधार कार्ड को पहचान के दस्तावेज के रूप में स्वीकार किया, लेकिन स्पष्ट किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है। साथ ही अदालत ने कहा कि किसी भी मतदाता का नाम हटाने से पहले प्राकृतिक न्याय और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में भविष्य की वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रियाओं के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकता है। अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।

