1985 में पहली बार विधानसभा पहुंचे... जानिए कैसा रहा 10 बार के CM रहे नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर
Thursday, Mar 05, 2026-12:52 PM (IST)
Nitish Kumar News : बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। सूबे के मुखिया नीतीश कुमार (Nitish Kumar) अब राज्य की कमान छोड़कर दिल्ली की ओर रुख कर रहे हैं। नीतीश कुमार आज यानी 5 मार्च को राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल करेंगे। यह बिहार की राजनीति में एक युग का अंत और एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।
आइए नजर डालते हैं 'सुशासन बाबू' के नाम से मशहूर नीतीश कुमार के अब तक के उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक सफर पर।
केंद्र से राज्य तक: शुरुआती राजनीतिक सफर
नीतीश कुमार का संसदीय सफर काफी प्रभावी रहा है। उन्होंने ज़मीनी स्तर से शुरुआत कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई:
1985: पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में बिहार विधानसभा पहुंचे।
1989: जनता दल (बिहार) के महासचिव बने और नौवीं लोकसभा के सदस्य चुने गए।
1994: जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी की नींव रखी।
1989-2004: लगातार बाढ़ निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीतकर अपनी पकड़ साबित की।
रेल मंत्री: अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार (2001-2004) में रेल मंत्री के रूप में उन्होंने कई बड़े सुधार किए।
मुख्यमंत्री की कुर्सी और 'रिकॉर्ड' शपथ ग्रहण
नीतीश कुमार के नाम भारत में सर्वाधिक बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का अनूठा रिकॉर्ड दर्ज है। उनका सफर कुछ इस तरह रहा:
| क्रम | शपथ की तिथि | गठबंधन / स्थिति |
| 1 | मार्च 2000 | केवल 7 दिन की सरकार (बहुमत की कमी) |
| 2 | 24 नवंबर 2005 | एनडीए (NDA) की पूर्ण बहुमत सरकार |
| 3 | 26 नवंबर 2010 | एनडीए के साथ दोबारा वापसी |
| 4 | 2014-15 | जीतन राम मांझी को कुर्सी देने के बाद पुनः वापसी |
| 5 | 20 नवंबर 2015 | महागठबंधन (RJD+Congress) के साथ |
| 6 | जुलाई 2017 | पाला बदलकर वापस NDA में शामिल हुए |
| 7 | 16 नवंबर 2020 | एनडीए की जीत के बाद सातवीं बार शपथ |
| 8 | अगस्त 2022 | एनडीए छोड़ फिर महागठबंधन में शामिल |
| 9 | 28 जनवरी 2024 | एक बार फिर एनडीए के साथ वापसी |
| 10 | नवंबर 2025 | हालिया विधानसभा चुनाव के बाद भव्य शपथ ग्रहण |
गठबंधन और बदलाव की राजनीति
नीतीश कुमार की राजनीति में सबसे बड़ा मोड़ 2013 में आया जब नरेंद्र मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाए जाने के विरोध में उन्होंने 17 साल पुराना एनडीए का साथ छोड़ दिया था। हालांकि, समय-समय पर विचारधारा और राजनीतिक समीकरणों के चलते उन्होंने कई बार 'पलटी' मारी, जिसके कारण विपक्ष उन्हें 'पलटूराम' कहता है, तो समर्थक उन्हें 'परिस्थितियों का कुशल खिलाड़ी' मानते हैं।

