उर्दू अदब के अमर हस्ताक्षर शाद अज़ीमाबादी: शायरी, इतिहास और शोध का अनूठा संगम

Friday, Jan 09, 2026-08:14 AM (IST)

Shad Azimabadi Jayanti: शाद अज़ीमाबादी (08 जनवरी 1846 – 07 जनवरी 1927) उर्दू साहित्य की उन महान विभूतियों में शामिल हैं, जिनका योगदान शायरी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इतिहास, शोध और गद्य लेखन तक फैला हुआ है। उनकी शख्सियत ऐसी थी, जिसमें एक संवेदनशील शायर, गंभीर विद्वान और जिम्मेदार प्रशासक—तीनों रूप एक साथ नजर आते हैं।

“तमन्नाओं में उलझाया गया हूँ,
खिलौने दे के बहलाया गया हूँ”

जैसी पंक्तियां आज भी इंसानी मन की उलझनों को बड़ी सादगी से बयान करती हैं।

रईस घराने से साहित्य की ऊंचाइयों तक

शाद अज़ीमाबादी का जन्म 1846 में अजीमाबाद (वर्तमान पटना) के एक प्रतिष्ठित रईस परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम सैयद अली मुहम्मद था। प्रशासनिक सेवा में भी उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाई और करीब 14 वर्षों तक पटना के म्यूनिसिपल कमिश्नर रहे। इसके अलावा उन्होंने स्पेशल मजिस्ट्रेट के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं।

उर्दू साहित्य के बहुआयामी रचनाकार

शाद अज़ीमाबादी उर्दू के बड़े और प्रभावशाली शायर माने जाते हैं। उन्होंने केवल ग़ज़ल ही नहीं लिखी, बल्कि मरसिया, रुबाइयाँ, क़तआ और मुखम्मस जैसी विधाओं में भी सशक्त रचनाएँ दीं।

प्रसिद्ध आलोचक मजनू गोरखपुरी ने उन्हें “नम आलूदगियों का शायर” कहकर उनकी संवेदनशील शैली को रेखांकित किया था।

इतिहास, उपन्यास और आत्मकथा में भी अमिट छाप

शाद अज़ीमाबादी का उपन्यास ‘पीर अली’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर लिखा गया पहला महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है। उनकी आत्मकथा ‘शाद की कहानी, शाद की ज़ुबानी’ न केवल उनके जीवन की कहानी कहती है, बल्कि उस दौर की सामाजिक और बौद्धिक परिस्थितियों को भी सामने रखती है।

विभिन्न विषयों पर उन्होंने लगभग 60 पुस्तकें लिखीं और हजारों शेर कहे। इसके साथ ही उन्होंने दर्जनों गद्य रचनाओं का संपादन भी किया, जो उनकी विद्वता और गहन अध्ययन का प्रमाण हैं।

धार्मिक अध्ययन और समन्वय की मिसाल

शाद अज़ीमाबादी केवल इस्लाम के ही नहीं, बल्कि हिंदू और ईसाई धर्म के भी गहरे अध्येता थे। उनकी रचनाओं में धार्मिक सहिष्णुता, मानवीय मूल्य और सामाजिक चेतना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यही कारण है कि उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक और प्रेरणादायी माना जाता है।

अदब की दुनिया में शाद अज़ीमाबादी की अमर विरासत

शाद अज़ीमाबादी का साहित्य उर्दू अदब की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने जिस दौर में लेखन किया, उस समय की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हलचलों को अपनी रचनाओं में जीवंत रूप दिया। उनकी लेखनी ने न सिर्फ उर्दू साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सोचने और सवाल करने की दृष्टि भी दी।


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Ramanjot

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