RTE पर बिहार सरकार सख्त! 10 अप्रैल तक एडमिशन नहीं दिया तो निजी स्कूलों पर गिरेगी गाज
Friday, Mar 27, 2026-10:21 PM (IST)
Bihar News: पटना से बड़ी खबर सामने आई है, जहां बिहार शिक्षा विभाग ने शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत निजी स्कूलों में नामांकन की प्रक्रिया को लेकर अहम फैसला लिया है। पहले तय समय सीमा में बड़ी संख्या में चयनित बच्चों को एडमिशन नहीं मिल पाने के कारण विभाग ने अब अंतिम तारीख बढ़ाकर 10 अप्रैल 2026 कर दी है। इस फैसले से उन हजारों परिवारों को राहत मिली है, जिनके बच्चों का चयन तो हो गया था लेकिन वे अब तक स्कूल में दाखिला नहीं ले पाए थे।
शिक्षा विभाग सख्त, अधिकारियों को दिए स्पष्ट निर्देश
शिक्षा विभाग ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) और जिला कार्यक्रम अधिकारियों (DPO) को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि हर हाल में 10 अप्रैल तक चयनित छात्रों का नामांकन पूरा कराया जाए।
साथ ही यह भी साफ कर दिया गया है कि यदि कोई स्कूल या संबंधित अधिकारी इस प्रक्रिया में लापरवाही करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। विभाग अब इस मामले में सख्त रुख अपनाता नजर आ रहा है।
हजारों सीटें अब भी खाली, इसलिए बढ़ानी पड़ी समय सीमा
विभाग के अनुसार, RTE एडमिशन के लिए ऑनलाइन रैंडमाइजेशन का पहला चरण 23 फरवरी को पूरा किया गया था। इस प्रक्रिया में पूरे राज्य से 70,155 छात्रों का चयन किया गया था। हालांकि चौंकाने वाली बात यह रही कि तय समय सीमा 20 मार्च तक सिर्फ 53,479 बच्चों का ही एडमिशन हो सका। बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने के कारण विभाग को मजबूरन समय सीमा बढ़ानी पड़ी।
शिक्षा निदेशक का सख्त पत्र, स्कूलों पर नजर
प्राथमिक शिक्षा निदेशक विक्रम विर्कर ने जिला स्तर के अधिकारियों को पत्र जारी कर साफ निर्देश दिया है कि शेष सभी चयनित बच्चों का नामांकन तय समय में पूरा कराया जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि जो स्कूल RTE नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं या एडमिशन में देरी कर रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव भेजा जाए। विभाग का मकसद है कि कोई भी पात्र बच्चा इस प्रक्रिया से बाहर न रह जाए।
RTE नियम क्या कहते हैं?
RTE कानून के तहत हर मान्यता प्राप्त निजी स्कूल में कक्षा 1 की कुल सीटों का 25% हिस्सा गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित होता है। इन बच्चों को स्कूल में मुफ्त शिक्षा के साथ-साथ यूनिफॉर्म और किताबें भी उपलब्ध कराई जाती हैं। साथ ही यह भी अनिवार्य है कि उनके साथ किसी तरह का भेदभाव न किया जाए। हालांकि अल्पसंख्यक संस्थानों को इस नियम से बाहर रखा गया है, इसलिए उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाता।
क्यों अहम है यह फैसला?
शिक्षा विभाग का यह कदम उन हजारों बच्चों के भविष्य से जुड़ा है, जो आर्थिक रूप से कमजोर होने के बावजूद बेहतर शिक्षा पाने का सपना देख रहे हैं। समय सीमा बढ़ने से अब इन बच्चों को एक और मौका मिला है, वहीं स्कूलों और अधिकारियों के लिए यह एक साफ संदेश है कि नियमों में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

